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"भारत देश अनेक भाषा-भाषियों का देश है|"
प्राथमिक स्तर पर बालक को मात्र-भाषा में शिक्षा दी जाए ,इसमें कोई दो राय नहीं | भारतीय शिक्षा सन्दर्भ में नियुक्त हुयी शिक्षा समीतियों नें इस विचार का पुरजोर समर्थन किया है|
                   'राधा क्रष्णन' की अध्यक्षता में बने ''विश्वविद्यालय आयोग'' ने तो विश्वविद्यालयी शिक्षा को भी प्रादेशिक भाषा में देने की बात कही | कितने प्रान्त और कितनी प्रादेशिक भाषाऐं सभी को अनूदित कैसे कराया जाए,अगर करा भी लिया जाए तो नित निर्मित होते ज्ञान को अनूदित कराने की समस्या | इसका समाधान यह है कि किसी एक भाषा राष्ट्र भाषा में समग्र आधुनिक व यूरोपीय का ज्ञान अनूदित करने से हो सकता है| इसके लिए निश्चित तौर पर हिन्दी भाषा का नाम लिया जा सकता है|
             बालक की प्राथमिक शिक्षा अगर मात्र भाषा में हो तो माध्यमिक और उच्च शिक्षा का माध्यम क्या हो?
जहाँ तक है आज यह बात सभी ने स्वीकार कर ली है,कि प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मात्र-भाषा ही उचित है| लेकिन 'बगुले' की 'हंस' बनने की कोशिश अभी भी इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही है ,कि मात्र भाषा ही प्राथमिक शिक्षा का उचित माध्यम है| ये बगुले रूपी ''पब्लिक स्कूल'' आज भी समाज को अपने ''हंस'' के रूप धारण करने की लालसा देकर भरमाये हुये हैं|
              मुझे खुशी होती है कि आज विश्वविद्यालय स्तर पर शास्त्रीय एवं प्रादेशिक भाषा को सम्मान दिया जाता है|
अभी कुछ दिन हुये मुझे यह जानकारी हुयी कि तमिलनाडु का विद्यार्थी ''तमिल भाषा'' में स्नातक की उपाधि ले सकता है जान कर मन को प्रसन्नता मिली|            
उपस्थित समस्या का हल दौलतराम कोठारी की अध्यक्षता में बने ''कोठारी कमीशन'' का ''त्रि-भाषा सूत्र'' हल करने का माद्दा रखता है|                  

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